यह उदाहरण केवल समझाने के लिए है।वास्तविक व्यवस्था
📊 रोजगार सहयोग गणित
यह मॉडल पैसा इकट्ठा करने का नहीं है। यह मॉडल गिनती के आधार पर जिम्मेदारी बाँटने का है।
🔹 मूल सिद्धांत
जब भी किसी एक बेरोज़गार व्यक्ति को स्वरोज़गार से जोड़ना होता है — तो जितने भी उस समय सहयोगी मित्र जुड़े होते हैं, उतनी ही संख्या में सहयोग बाँटा जाता है।
👉 कोई fixed रकम नहीं होती 👉 कोई जबरदस्ती नहीं होती 👉 केवल बराबर-बराबर भागीदारी होती है
🔹 उदाहरण — 10,000 सहयोगी मित्र
मान लीजिए —
- 🎯 लक्ष्य: 10,000 सहयोगी मित्र
- 💼 एक रोजगार तैयार करने की आवश्यकता: ₹1,00,000
अब गणित देखिए —
₹1,00,000 ÷ 10,000 = ₹10
अर्थात — हर सहयोगी मित्र केवल ₹10 देकर एक बेरोज़गार को स्वरोज़गार की दिशा में खड़ा कर सकता है।
यही इस मॉडल की आत्मा है।
🔹 गिनती बढ़ेगी — बोझ घटेगा
जैसे-जैसे सहयोगी मित्रों की संख्या बढ़ती जाती है — वैसे-वैसे एक व्यक्ति पर आने वाला भार घटता जाता है।
| सहयोगी मित्र | प्रति व्यक्ति सहयोग |
|---|---|
| 1,000 | ₹100 |
| 5,000 | ₹20 |
| 10,000 | ₹10 |
| 20,000 | ₹5 |
👉 यही कारण है कि यह मॉडल भीड़ नहीं — सहभागिता पर चलता है।
🔹 पैसा किसे मिलता है?
यह राशि —
- ❌ किसी व्यक्ति को नहीं जाती
- ❌ किसी जेब में नहीं जाती
- ❌ किसी लाभ के लिए नहीं जाती
यह राशि सीधे —
👉 उस कर्मयोगी के स्वरोज़गार को खड़ा करने में लगती है
जैसे — दुकान, माल, साधन, प्रारंभिक व्यवस्था।
🔹 अंतिम सत्य
यह मॉडल अमीर बनने का नहीं है।
यह मॉडल यह कहता है —
“अगर 10,000 लोग ₹10 भी ईमानदारी से दें — तो कोई बेरोज़गार भूखा नहीं रहेगा।”
यही रोजगार सहयोग गणित है।
